2007/06/02

गुलाब की पंखुडियां


आज भी महकती हैं

तुम्हारे गुलाब की कलियाँ

मेरे अंतरंग में।

खुलती हथेलियों में

जब गुलाब की पंखुडियां

अलसाई सी आंख खोलती हैं

तब मदमाते, लहराते तुम आते हो।

हर सांझ

बनते हैं कई किरदार मेरी कल्पनाओं में

बनते हैं, बिगड़ते हैं

रह जाते हो तो तुम

और वही

तुम्हारी गुलाब की पंखुडियां...

3 comments:

tarun said...

its really beautiful.......

halchal said...

keep it up bahut khub

halchal said...

u know charoo tum bahut accha likhti ho.....


prabhat dixit hindustan