2007/06/02

अक्स

रिश्तों के

दरियों में देखती हूँ

अपना धुंधला अक्स

पानी की पतली परत

के नीचे झिलमिलाते से बुलबुले

बनते हैं, बिगड़ते हैं

एक बार फिर,

लहरों के साथ

बह जाता है

मेरा धुंधला अक्स।

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